A silent girl…..by kaali (Akash

एक ओरत की कलम से …

छोटी थी जब,  बहुत ज्यादा बोलती थी
माँ हमेशा झिडकती ,
चुप रहो ! बच्चे ज्यादा नहीं बोलते .

थोड़ी बड़ी हुई जब , थोड़ा ज्यादा बोलने पर
माँ फटकार लगाती
चुप रहो ! बड़ी हों रही हों .

जवान हुई जब , थोड़ा भी बोलने पर
माँ जोर से डपटती
चुप रहो  , दूसरे के घर जाना है .

ससुराल गई जब , कु़छ भी बोलने पर
सास ने ताने कसे ,
चुप रहो , ये तुम्हारा मायका नहीं .

गृहस्थी संभाला जब , पति की किसी बात पर बोलने पर
उनकी डांट मिली ,
चुप रहो ! तुम जानती ही क्या हों ?

नौकरी पर गई , सही बात बोलने पर
कहा गया
चुप रहो ! अगर काम करना है तो

थोड़ी उम्र ढली जब ,  अब जब भी बोली तो
बच्चों ने कहा
चुप रहो ! तुम्हें इन बातों से क्या लेना .

बूढ़ी हों गई जब , कुछ भी बोलना चाहा तो
सबने कहा
चुप रहो ! तुम्हें आराम की जरूरत है .

इन चुप्पी की तहों में , आत्मा की गहों में
बहुत कुछ दबा पड़ा है

उन्हें खोलना चाहती हूँ , बहुत कुछ बोलना चाहती हूँ
पर सामने यमराज खड़ा है , कहा उसने
चुप रहो ! तुम्हारा अंत आ गया है
और मैं चुपचाप चुप हो गई
हमेशा के लिए .

This is your admin Sunil Gupta, Please follow me on Instagram for questions and complaints or drop an email here

Comments

comments

2 Comments

  1. Pihu

    Heart touching poem Akash!
    Nd u r right …..

    Reply
  2. Vshal

    Well written…

    Reply

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: