फर्क नहीं पड़ता

जान है जो मेरी, उसे अब फर्क नहीं पड़ता,
जियूँ या मरूँ, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
कहती थी जो तुम बिन जी नहीं सकती,
अब मेरे ना होने से उसे फर्क नहीं पड़ता।

लम्हे भर बात ना हो तो रोना आता था उसे,
अब दिनभर बात ना हो, फिर भी उसे फर्क नहीं पड़ता।
डरता हूँ कुछ भी बोलने से पहले,
वो सब कह देती है, उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता।

तरस जाता हूँ पलभर भी उसके प्यार की खातिर,
मगर मैं क्यों कहूँ ये सब, उसे अब फर्क नहीं पड़ता।
रातभर जागकर यही सोचता हूँ मैं,
क्यों बहते हैं ये आँसू, जब उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता।

कैसे समझाऊँ उसे कि मेरी है वो सब कुछ,
मेरी कसमों से भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
ज़रा सी देर हो जाए तो गुस्सा होती थी मुझ पर,
अब घंटों भी ना करूँ रिप्लाई, उसे फर्क नहीं पड़ता।

हर एक बेरुखी उसकी लगती है तीर की तरह,
होता हूँ मैं कितना हर्ट, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
पहले कहती थी, “ना जाना दूर कहीं मुझसे,”
अब उसके शहर में भी ना आऊँ, तो उसे फर्क नहीं पड़ता।

रहूँ कितना भी गुस्सा, मानाने वो नहीं आती,
मेरे गुस्से से भी अब उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

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